ब्लैक होल्स क्या है?

ब्लैक होल्स या कृष्ण विवर एक ऐसा अनोखा रहस्यमयी विषय है, जिसके बारे में जानने के लिए हम सभी इंसान बहुत ही उत्सुक रहते हैं। आज के लेख में हम ब्लैक होल्स क्या हैं? ब्लैक होल्स कैसे बनते हैं? ब्लैक होल्स कितने प्रकार के होते हैं? ब्लैक होल्स क्या खाते हैं? ब्रह्मांड का सबसे बड़ा ब्लैक होल कोन सा है? ब्रह्मांड का सबसे छोटा ब्लैक होल कौन सा है? ब्लैक होल के होने की सबसे पहले जानकारी किसने दी? क्या कोई ब्लैक होल सूर्य को निगल सकता हैं? ब्लैक होल के इवेंट होराइजन का क्या मतलब है? अगर हम ब्लैक होल के अंदर चले जाए तो हमारा क्या होगा? क्या ब्लैक होल पृथ्वी को निगल सकता हैं? या पृथ्वी ब्लैक होल में चली जाए तो क्या होगा? ब्लैक होल बनने में कितना समय लगता है? क्या कोई ब्लैक होल पूरी आकाशगंगा या ब्रह्मांड को निगल सकता हैं? क्या ब्लैक होल छोटे हो सकते हैं? क्या ब्लैक होल एक प्राकृतिक टाइम मशीन है? क्या ब्लैक होल ब्रह्मांड का दानव है या वैक्यूम क्लीनर? क्या हमारा ब्रह्मांड एक ब्लैक होल के अंदर है? क्या ब्लैक होल के अंदर जाने से कोई तारा बचा है? सक्रिय और निष्क्रिय ब्लैक होल्स क्या है? क्या कोई निष्क्रिय ब्लैक होल दुबारा सक्रिय हो सकता हैं? सबसे पहले ब्लैक होल की तस्वीर कब, कैसे और किसने ली? ब्लैक होल की आयु सीमा क्या है? या वे कैसे खत्म होते है? ब्लैक होल से कैसी आवाज आती है? सनातन धर्म के अनुसार ब्लैक होल क्या है? हमारी अपनी काल्पनिक धारना ब्लैक होल के विषय में जानेंगे।

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ब्लैक होल्स क्या है? 

ब्लैक होल्स ब्रह्मांड की सबसे विचित्र चीज़ है, यह एक ऐसा अद्भुत रहस्यमयी खगोलीय पिंड है, जहां एक छोटे से आयतन में बहुत अधिक मात्रा में गुरुत्वाकर्षण बल भरा होता है और यह ब्लैक होल का मध्य भाग होता है जिसे सिंगुलैरिटी कहते है, इनमे गुरुत्वाकर्षण बल इतना ज़्यादा होता है कि प्रकाश भी वहां से बाहर नहीं निकल पाता जिसकी गति सबसे तेज है। ब्लैक होल पर फिजिक्स के सारे नियम फेल हो जाते है। ये विशालकाय तारों के ढहने से बनते हैं और शायद अन्य तरीकों से भी बनते हैं जो अभी तक अज्ञात हैं। ब्लैक होल को देखा नहीं जा सकता क्योंकि वह अदृश्य होते हैं। ब्लैक होल को स्पेस टेलीस्कोप की मदद से खोजा जाता है। ब्लैक होल अपने आस-पास वाली सभी चीजों को अपने अत्यंत तीव्र गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा निगल लेते हैं और इस तरह यह अपना आकार और गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ाते रहते हैं, हालांकि ये पदार्थों को अंधाधुंध तरीके से नहीं खींचते हैं, केवल वे वस्तुएं ही अंदर खींची जाती हैं जो इनके घटना क्षितिज को पार करती हैं। सुरक्षित दूरी पर परिक्रमा करने वाली वस्तुएं अप्रभावित रहती हैं, ठीक उसी तरह जैसे किसी तारे के चारों ओर ग्रह रहते हैं। आपको मालूम होगा कि सूर्य भी एक तारा है और हमारे सौरमंडल के सारे ग्रह उसके चारो और चक्कर लगाते हैं। कुछ लोग ब्लैक होल को ब्रह्मांड का दानव और नरक का द्वार भी कहते हैं। इसके अत्यंत तीव्र गुरुत्वाकर्षण की वजह से समय और अंतरिक्ष(स्थान) का मतलब इसपर आकर खत्म हो जाता है। अत्यंत तीव्र गुरूत्वाकर्षण पावर की वजह से समय यहां बहुत ही धीमा चलता है। वैज्ञानिकों के अनुसार अगर कोई इंसान ब्लैक होल के पास कुछ घंटे बिता सके तब तक धरती पर हजारों साल बीत जायेंगे। वैज्ञानिक इसे प्राकृतिक टाईम मशीन भी कहते है। आमतौर पर ब्लैक होल्स चार प्रकार के होते हैं जिनमें से दो मुख्य है पहला तारे के आकार के ब्लैक होल्स जिसे तारकीय ब्लैक होल कहते हैं और दूसरा अतिविशाल ब्लैक होल्स जिसे सुपरमैसिव ब्लैक होल्स कहते हैं, जो सभी आकाशगंगाओ के केंद्र में स्थित है।

बड़े ब्लैक होल्स अपने आस-पास के तारे, ग्रह, गैस, धूल, प्रकाश, छोटे ब्लैक होल्स और अन्य अंतरिक्ष पदार्थ को निगलने की क्षमता रखते है जो इसके घटना क्षितिज को पार कर लेते है लेकिन आकशगंगा और पूरे ब्रह्मांड को नही। ब्लैक होल्स को प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं देखा जा सकता लेकिन इसके आस-पास के पदार्थों पर इसके गुरुत्वाकर्षण प्रभावों को देखकर इसका पता लगाया जा सकता है। जब कोई तारा और ब्लैक होल्स एक दूसरे के करीब आते है तो बहुत ज्यादा ऊर्जा वाला प्रकाश बनता हैं। ब्लैक होल के चारो और घूमने वाला पदार्थ गर्म हो जाता हैं और विकिरण उत्सर्जित करता है जिसे देखा जा सकता हैं। ब्लैक होल में गिरने वाला पदार्थ एक डिस्क बनाता है, जो बाथटब के नाले में पड़ने वाले भंवर की तरह होता है। वैज्ञानिक अंतरिक्ष में दूरबीनाे और उपग्रहों की सहायता से इस प्रकाश को देखते हैं। वैज्ञानिक इसे इवेंट होराइजन टेलीस्कोप (EHT) से देखते है जो दुनियाभर में मौजूद आठ रेडियो वैधशालाओ को जोड़कर बनाया गया है। वैसे हम बता दे की दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने जितना भी ब्रह्मांड के बारे में जाना है, वह सिर्फ 5% है जिनमे तारे, ग्रह, सूर्य, चंद्रमा, ब्लैक होल, उल्का पिंड, आकाशगंगाए, क्षुद्र ग्रह, धूमकेतु, गैस, धूल और बादल आदि है, बाकी का 95% अभी भी अज्ञात है जो डार्क मैटर और डार्क एनर्जी है (डार्क मैटर एक ऐसा अदृश्य पदार्थ है जो गुरुत्वाकर्षण के माध्यम से तारों, आकाशगंगाओं और अन्य खगोलीय संरचनाओं को एक साथ बांधे रखता है, यह ब्रह्मांड के कुल द्रव्यमान का लगभग 27% हिस्सा बनाता है। जबकि डार्क एनर्जी एक रहस्यमय ऊर्जा है जो “एंटी-ग्रेविटी” की तरह काम करती है और ब्रह्मांड के विस्तार को तेज़ करती है। यह ब्रह्मांड के कुल द्रव्यमान और ऊर्जा का लगभग 68% हिस्सा बनाती है। ये दोनों मिलकर ब्रह्मांड का लगभग 95% हिस्सा बनाते हैं, डार्क मैटर “बांधने वाला” गुरुत्वाकर्षण बल है, जबकि डार्क एनर्जी “धकेलने वाला” प्रतिकर्षी बल है। डार्क मैटर पदार्थ है, जबकि डार्क एनर्जी एक प्रकार की ऊर्जा है। लेकिन हम इन्हें सीधे तौर पर देख या समझ नहीं सकते हैं, केवल इनके प्रभाव ही देख सकते हैं।) वैज्ञानिकों का मानना है की डार्क एनर्जी की स्पीड प्रकाश की स्पीड से भी तेज है और हमारा ब्रह्मांड डार्क एनर्जी की हाई स्पीड से लगातार फैलता जा रहा है जो अंतरिक्ष पदार्थ पहले एक दूसरे के करीब नजर आते थे अंतरिक्ष में अब वह एक दूसरे से दूर होते जा रहे है। जिस आकाशगंगा में हम रहते है उसका नाम मिल्की वे है। आप जानते की हम पृथ्वी में रहते हैं जो हमारी  मिल्की वे आकाशगंगा के सौरमंडल का एक ग्रह है, हम उसी के पृथ्वीवासी हैं। पृथ्वी के पास वाला ब्लैक होल पृथ्वी से 1,560 प्रकाश वर्ष दूर है, इसका नाम Gaia BH1 है। यह हमारे  सूरज से 10 गुना बड़ा है और यह अपने तारे से उतनी ही दूरी पर चक्कर लगा रहा है जितनी दूरी पर पृथ्वी सूरज का चक्कर लगा रही है। हालाँकि यह ब्लैक होल पृथ्वी से काफी दूर है।  

सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक पहुँचने में लगभग 8 मिनट और 20 सेकंड (लगभग 500 सेकंड) का समय लगता है। यह प्रकाश सूर्य की सतह से लगभग 150 मिलियन किलोमीटर (93 मिलियन मील) की दूरी तय करता है, जो निर्वात में लगभग 300,000 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से यात्रा करता है। इसलिए प्रकाश की गति सबसे तीव्र गति मानी जाती है और अंतरिक्ष के सभी पदार्थो (तारे, ग्रह, ब्लैक होल्स, आकाशगंगाए आदि) के बीच की दूरी का आकलन प्रकाश की गति से किया जाता हैं।

पृथ्वी में दूरी हम किलोमीटर से नापते है जबकि ब्रह्मांड में लंबी दूरी मापने के लिए एक महत्वपूर्ण इकाई है। एक प्रकाश वर्ष लगभग 9.46 ट्रिलियन किलोमीटर (यानी 6 ट्रिलियन मील) के बराबर है। मौजूदा समय में अंतरिक्ष में दूरी मापने के लिए रडार मापन विधि का इस्‍तेमाल किया जाता है। इस विधि में प्रकाश की गति 3 लाख किमी प्रति सेकेंड को आधार बनाया जाता है। यह तकनीक सबसे सटीक मानी जाती है। रडार मापन विधि की भी अपनी सीमाएं हैं।इस विधि द्वारा ही कोई भी तारा, ग्रह, ब्लैक होल आदि अन्य ऑब्जेक्ट्स एक दूसरे से कितने प्रकाशवर्ष दूर है हमें पता चलता है। किसी भी दो अंतरिक्ष या ब्रह्मांडीय पदार्थ की दूरी प्रकाशवर्ष में नापी जाती हैं, यह दूरी अंतरिक्ष या ब्रह्मांड के समय के हिसाब से छोटी होती है लेकिन हम मनुष्यों के समय के हिसाब से बहुत ज्यादा होती है (ध्यान रहे हम पृथ्वीवासी है, और पृथ्वी भी एक ग्रह है जो ब्रह्माण्ड में ही मौजूद हैं, यानि की सब कुछ ब्रह्मांड के अंदर है)।

हमारे ब्रह्मांड में अरबों आकाशगंगाएँ हो सकती हैं, और वैज्ञानिक अनुमान अलग-अलग हैं, लेकिन यह संख्या 100 अरब से लेकर 2 ट्रिलियन (2 लाख करोड़) तक हो सकती है, जैसा कि नासा और हबल टेलीस्कोप के आंकड़ों के सर्वेक्षणों से पता चलता है। ये अनुमान अवलोकन योग्य ब्रह्मांड की संख्या पर आधारित हैं, जिसमें अभी भी अज्ञात की संख्या शामिल हो सकती है। हबल स्पेस टेलीस्कोप ने एक छोटे से हिस्से में हजारों आकाशगंगाएँ देखीं, जिससे पूरे आकाश के लिए संख्या का अनुमान लगाना संभव हुआ। ब्रह्मांड बहुत बड़ा और अभी भी पूरी तरह से अज्ञात है, और भविष्य की प्रौद्योगिकियों और दूरबीनों (जैसे जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप) के साथ, यह संख्या बदल भी सकती है। 

हमारी मिल्किवे आकाशगंगा की तरह सभी आकाशगंगाओं में अनुमानित तौर पर खरबों ब्लैक होल हो सकते हैं, जिनमें से अधिकांश तारकीय द्रव्यमान के होते हैं और हर आकाशगंगा में कम से कम एक सुपरमैसिव ब्लैक होल है जो उनके केंद्र में होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारी आकाशगंगा मिल्की वे में लगभग 100 मिलियन ब्लैक होल हो सकते है। अवलोकनीय ब्रह्मांड में सैकड़ों अरबों आकाशगंगाएँ हैं, इसलिए वहाँ बहुत सारे ब्लैक होल हो सकते हैं। एक अनुमान के अनुसार, ब्रह्मांड में 40 ट्रिलियन से भी अधिक ब्लैक होल हो सकते है। ब्लैक होल का पता लगाना मुश्किल होता है क्योंकि वे प्रकाश को भी अवशोषित कर लेते हैं। वैज्ञानिक ब्लैक होल के आसपास के पदार्थ के व्यवहार और गुरुत्वाकर्षण तरंगों का अध्ययन करके उनका पता लगाते हैं। सुपरमैसिव ब्लैक होल आकाशगंगाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे आकाशगंगाओं के केंद्र में भारी मात्रा में पदार्थ जमा करते हैं, जो तारों के निर्माण और आकाशगंगा के आकार को प्रभावित करता है। हमारी आकाशगंगा के केंद्र में एक सुपरमैसिव ब्लैक होल है, जिसे सैजिटेरियस ए* (Sagittarius A*) कहा जाता है। यह ब्लैक होल सूर्य के द्रव्यमान का 4 मिलियन गुना है।

जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप ने ऐसे सुपरमैसिव ब्लैक होल की खोज की है जिसे अब तक का सबसे पुराना ब्लैक होल माना जा रहा है। इस ब्लैक होल का वैज्ञानिक नाम QSO1 है, इसका द्रव्यमान 5 करोड़ सुर्यो के बराबर है। QSO1 की उत्पति बिग बैंग के लगभग 600-750 मिलियन साल बाद हुई थी। इस ब्लैक होल के पास कोई बड़ी आकाशगंगा नही है, जिसकी वजह से वैज्ञानिक इसे नग्न ब्लैक होल कहते हैं। शुरूआत में QSO1 को एक छोटे लाल बिंदु के रूप में देखा था, ऐसा लगा जैसे यह बेहद घनी और चमकीली आकाशगंगा है। पर हालिया रिसर्च से सामने आया कि यह कोई आकाशगंगा नही है बल्कि एक सुपरमैसिव ब्लैक होल है जो अकेला है।

खगोलविदों ने अब एक ऐसा भी ब्लैक होल पकड़ लिया है जिसने साइंस की थ्योरी को ही मजाक बना दिया। इसका नाम है RACS J0320-35. यह दानव बिग बैंग के सिर्फ 92 करोड़ साल बाद ही पैदा हुआ था और तब से लगातार बेलगाम तरीके से बढ़ रहा है। नासा के चंद्रा एक्स-रे ऑब्जर्वेटरी से हुई ऑब्जर्वेशन में पता चला कि यह ब्लैक होल एक अरब सूरज जितना भारी है और इसकी भूख इतनी जबर्दस्त है कि यह एडिंग्टन लिमिट को भी तोड़ चुका है. यह वही थ्योरी है जो कहती है कि ब्लैक होल अपनी रेडिएशन और ग्रैविटी के बैलेंस से ज्यादा तेजी से नहीं बढ़ सकते, लेकिन RACS J0320-35 2.4 गुना स्पीड से बढ़ रहा है। यानी यह हर साल 300 से 3,000 सूरज जितना मटेरियल निगल रहा है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर यह दानव नियम तोड़कर भी स्थिर है तो जरूर कोई नया फिजिक्स गेम खेल रहा है जिसे हम अभी समझ नहीं पाए हैं। माना जाता है कि यह ब्लैक होल शायद शुरुआत में किसी बहुत बड़े तारे के फटने से बना था जिसकी मास 100 सूरज से कम रही होगी, फिर भी यह पलभर में दानव बन गया। अब सवाल यह है कि क्या शुरुआती ब्रह्मांड में ऐसे ही ‘फास्ट ईटर्स’ आम थे? अगर हां, तो हमारी थ्योरी गलत और ब्रह्मांड हमारी सोच से कहीं ज्यादा वाइल्ड था।
वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे ब्लैक होल्स गार्गेंचुअन एनर्जी जेट्स भी उगल सकते हैं, जो शुरुआती गैलेक्सियों को आकार देने में अहम रोल निभाते होंगे। यानी ये ब्लैक होल सिर्फ निगलते ही नहीं, बल्कि ब्रह्मांड को गढ़ते भी थे।
खगोलविदों ने एक और नया चमत्कार देखा, उन्होंने पहली बार 2 Black Hole की एक-दूसरे के चारों ओर परिक्रमा करते हुए तस्वीर ली है, इससे ब्लैक होल के जोड़ों के होने का पहला Visual Proof मिल गया है। यह दृश्य जमीन और अंतरिक्ष में लगी दूरबीनों द्वारा पकड़ा गया। इसमें रेडियो प्रकाश के हल्के उतार-चढ़ाव को देखा गया। ये दोनों ब्लैक होल पृथ्वी से करीब 5 अरब प्रकाश वर्ष दूर हैं और 12 साल में एक-दूसरे का एक चक्कर पूरा करते हैं।
बता दें कि, यह लगभग प्रकाश की गति से घूमने वाले कणों की एक की जेट बनाता है। यह एक विशाल राक्षस है जिसका वजन हमारे सूर्य से लगभग 18 अरब गुना ज्यादा है। यह ब्लाजर OJ287 नाम का एक बड़ा ब्रह्मांडीय फव्वारा भी बनाता है. शोधकर्ताओं ने अपने ये नतीजे 9 अक्टूबर को द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित किए।
फिनलैंड के तुर्कू विश्वविद्यालय के खगोलशास्त्री और रिसर्च के मुख्य लेखक मौरी वाल्टोनन ने एक बयान में कहा, पहली बार हम 2 ब्लैक होल की एक-दूसरे के चारों ओर चक्कर लगाते हुए तस्वीर लेने में कामयाब रहे। तस्वीर में ब्लैक होल अपनी तेज कणों की जेट के कारण पहचाने जा रहे हैं. ब्लैक होल खुद पूरी तरह से काले होते हैं लेकिन हम उन्हें इन कणों की जेट या उनके चारों ओर चमकती हुई गैस से पहचान सकते हैं।
ब्लैक होल विशाल तारों के गिरने या ढहने से बनते हैं। ये गैस, धूल, तारे और अन्य ब्लैक होल को खाकर बड़े होते जाते हैं. इनमें से कुछ लालची ब्लैक होल में जब पदार्थ सर्पिल गति में उनके मुंह में घूमता है तो घर्षण की वजह वह गर्म हो जाता है। इससे प्रकाश निकलता है जिसे दूरबीनें देख सकती हैं। इन्हीं को सक्रिय गैलेक्टिक नाभिक (AGN)कहा जाता है।
क्वासर(Quasar) ये सबसे भयानक AGN होते हैं। ये सुपरमैसिव ब्लैक होल होते हैं जिनका वजन सूर्य से अरबों गुना ज्यादा होता है। जब ये अपनी गैस की परतें गिराते हैं तो सबसे चमकीले तारों से खरबों गुना ज्यादा चमकदार प्रकाश छोड़ते हैं। ब्लैक होल बड़े तारों के ढहने से बनते हैं, जब ये चीजें खाते हैं तो तेज रोशनी छोड़ते हैं जिसे AGN कहते हैं। सबसे चमकदार AGN क्वासर होते हैं और जब उनकी रोशनी सीधी हमारी तरफ आती है तो उन्हें ब्लाजर कहते हैं।
वैज्ञानिकों ने पृथ्वी जैसे कई अन्य ग्रह भी खोजे है जिन्हे सुपर-अर्थ कहते हैं। सुपर-अर्थ ऐसे एक्सोप्लेनेट (हमारे सौरमंडल से बाहर के ग्रह) होते हैं जिनका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान से 1 से 10 गुना अधिक होता है, लेकिन यूरेनस या नेपच्यून जैसे बर्फीले ग्रहों से हल्के होते हैं। वैज्ञानिकों ने अब तक हजारों सुपर-अर्थ की खोज की है, और यह संख्या लगातार बढ़ रही है, क्योंकि सुपर-अर्थ हमारे सौर मंडल में अन्य ग्रहों की तुलना में अधिक सामान्य माने जाते हैं।
एक सुपर-अर्थ का वर्गीकरण केवल उसके द्रव्यमान पर आधारित होता है। इसका मतलब है कि यह पृथ्वी से बड़ा है, लेकिन नेपच्यून से छोटा है। ये ग्रह गैस, चट्टान या दोनों के संयोजन से बने हो सकते हैं। कुछ जलीय ग्रह हो सकते हैं, कुछ स्नोबॉल ग्रह और कुछ घने गैस से बने ग्रह हो सकते हैं। सुपर-अर्थ को जीवन की संभावना वाले ग्रहों के रूप में देखा जाता है क्योंकि वे चट्टानी और संभावित रूप से रहने योग्य हो सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने अपनी खोजों के दौरान कई तरह के सुपर-अर्थ खोजे हैं, और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। इन सुपर-अर्थ की सही गिनती एक निश्चित आंकड़ा नहीं है, क्योंकि खगोलविद हर समय नए ग्रहों की खोज करते रहते हैं और उनकी पहचान की पुष्टि करते रहते हैं। अब तक पाए गए ग्रहों की कुल संख्या हज़ारों में है, और नासा के अनुसार, दुनिया भर के वैज्ञानिकों द्वारा हर दिन नए एक्सोप्लैनेट की खोज की जा रही है।

TOI-1846b यह पृथ्वी से दो गुना बड़ा और चार गुना भारी है, और अपने तारे की परिक्रमा केवल 3.93 दिनों में पूरी करता है, यानी यहाँ एक साल सिर्फ़ चार दिन का होता है। (ध्यान रहे कि सूरज भी एक तारा है) हमारी पृथ्वी अपने तारें यानि सूरज का चक्कर लगाने में अधिक सटीक रूप से, 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट और 46 सेकंड का होता है, जिसे हम एक वर्ष कहते हैं।

HD 20794 d यह ग्रह पृथ्वी से 20 प्रकाश वर्ष दूर है और इसे जीवन की संभावना वाले सबसे अच्छे ग्रहों में से एक माना जा रहा है।
सुपर अर्थ हमसे अलग अलग दूरियों पर है, जैसे TOI-715 b 137 प्रकाश वर्ष दूर है, 55 कैनक्री e 41 प्रकाश वर्ष दूर है, और HD 20794d 20 प्रकाश वर्ष दूर है। ये ग्रह पृथ्वी की तुलना में बड़े हैं, और उनकी दूरी इस बात पर निर्भर करती है कि वे कहाँ स्थित हैं।
सौरमंडल के अन्य ग्रह पर जीवन की तलाश में वैज्ञानिक सालों से रिसर्च कर रहे हैं। शुक्र ग्रह को लेकर चौंकाने वाली बात सामने आई है, दरअसल अमेरिकी वैज्ञानिकों की एक टीम ने 50 साल पुराने डेटा को दोबारा से जांचा है जिससे पता कि शुक्र ग्रह पर पानी है।
शुक्र ग्रह के बादलों में केवल पानी की कमी थी। अब पता चला है कि वहा पानी है लेकिन यह पानी तेजाबी पानी है जो कि पृथ्वी के जीवों और इंसान के लिए कठिन है. वहां पर एसिड सहने वाले जीव ही रह सकते हैं, लेकिन यह खोज नई दिशा देगी।
वैसे वैज्ञानिक भविष्य में चांद और मंगल ग्रह पर नई-नई तकनीकों द्वारा मनुष्यों के रहने की प्लानिंग बना रहे है।
हमारी आकाशगंगा, जिसे मिल्की वे भी कहा जाता है, एक सर्पिल आकाशगंगा है, जिसमें एक केंद्रीय उभार और सर्पिल भुजाएं है। यह एक विशाल, चमकदार डिस्क है जिसमें लगभग 100 अरब तारे, गैस और धूल के बादल शामिल हैं। इस आकाशगंगा की संरचना में घुमावदार भुजाएं हैं, और हमारा सौर मंडल भी इसी आकाशगंगा में एक सर्पिल भुजा पर स्थित है। यह आकाशगंगा बहुत बड़ी है, इसका व्यास लगभग 100,000 प्रकाश वर्ष है। हमारा सौर मंडल, जिसमें पृथ्वी और सूर्य भी शामिल हैं, मिल्की वे आकाशगंगा की एक सर्पिल भुजा पर स्थित है। मिल्की वे के केंद्र में एक सुपरमैसिव ब्लैक होल है। मिल्की वे का नाम “दूधिया आकाश” से लिया गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि पृथ्वी से देखने पर आकाश में इसके तारों की चमक दूधिया रास्ते जैसी दिखती है.।

आकाशगंगाएँ तारों, गैस, धूल और काले पदार्थ (डार्क मैटर) का विशाल संग्रह होती हैं, जो गुरुत्वाकर्षण द्वारा एक साथ बंधे होते हैं, और इनके अंदर कई तरह की संरचनाएँ और घटक होते हैं, जैसे की कुछ आकाशगंगाओं के पास छोटी आकाशगंगाएँ होती हैं, जो उनकी परिक्रमा करती हैं उन्हें उपग्रह आकाशगंगाएँ कहते हैं।

ब्रह्मांड के विस्तार की वजह से आकाशगंगाएं एक-दूसरे से दूर होती जा रही हैं। ब्रह्मांड के विस्तार की वजह से तारों, ग्रहों, ब्लैक होल्स, आकाशगंगाओं, उल्कापिंड आदि का निर्माण लगातार होता रहता है। ब्रह्मांड का विस्तार लगातार होने की वजह से गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युतचुम्बकीय बल और अन्य बलों का उत्सर्जन होता है। 

ब्रह्मांड इतना बड़ा है कि इसकी सीमा का अंदाजा लगाना मुश्किल है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जो ब्रह्मांड हम देख सकते हैं, वो असल में इसके छोटे से हिस्से जैसा है. इसके बाहर क्या है, ये अभी भी एक बड़ा सवाल है।

अवलोकनीय ब्रह्मांड, ब्रह्मांड का वह भाग है जिसे पृथ्वी से देखा जा सकता है। यह एक सीमित क्षेत्र है, जिसकी सीमा प्रकाश की गति और ब्रह्मांड की आयु द्वारा निर्धारित होती है। इसका अर्थ है कि अवलोकनीय ब्रह्मांड से परे स्थित वस्तुओं का प्रकाश अभी तक पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाया है।

ब्रह्मांड के निरंतर विस्तार के कारण, अवलोकनीय ब्रह्मांड का आकार भी समय के साथ बढ़ता रहता है। ब्रह्मांड का विस्तार और प्रकाश की गति की सीमा के कारण, हम अवलोकनीय ब्रह्मांड से परे स्थित वस्तुओं को कभी नहीं देख सकते। अवलोकनीय ब्रह्मांड के बारे में जानने से हमें ब्रह्मांड की संरचना, विकास और भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारे ब्रह्मांड के अलावा भी कई और ब्रह्मांड है। इसे मल्टीवर्स थ्योरी कहा जाता है, हालांकि, इन ब्रह्मांडों का पता लगाना संभव नहीं है, क्योंकि आकाश अनंत है और इसका कोई किनारा नहीं है। बिग बैंग के बाद ब्रह्मांड तेज़ गति से फैला था। इस दौरान क्वांटम उतार-चढ़ाव हुए, जिससे अलग-अलग बुलबुले ब्रह्मांड बने। गणितीय समीकरण बताते हैं कि एक से ज़्यादा ब्रह्मांड हो सकते हैं। 

कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि ब्लैक होल अन्य ब्रह्मांडों के लिए द्वार हो सकते हैं। जब एक तारा ब्लैक होल में गिरता है, तो यह अपना ब्रह्मांड बनाता है। यह एक बेबी यूनिवर्स हो सकता है, जो अपने समय और भौतिकी के नियमों के साथ अलग हो।

कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि हमारा ब्रह्मांड किसी बड़े ब्रह्मांड के ब्लैक होल के अंदर मौजूद हो सकता है और जो अन्य ब्लैक होल्स हमारे ब्रह्मांड में है उसके अंदर भी अन्य ब्रह्मांड हो सकते हैं।

हालांकि, हमें ब्लैक होल के भीतर क्या होता है, इस बारे में बहुत कम जानकारी है। हम ब्लैक होल के बारे में अधिक जानने के लिए शोध जारी रखते हैं वैसे भी यह दिलचस्प विचार है जो हमें ब्रह्मांड के बारे में और जानने में मदद कर सकता है।

इन ब्रह्मांडों में से किसी से संपर्क करना संभव नहीं है। इन ब्रह्मांडों में से किसी को भी सच की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। ब्रह्मांड के बाहर क्या है? यह सवाल सदियों से वैज्ञानिकों और दार्शनिकों को परेशान करता रहा है। ब्रह्मांड के बाहर क्या है? इसका कोई निश्चित जवाब नहीं है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, ब्रह्मांड का कोई अंत नहीं है, यह अनंत है. कुछ धार्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण भी इसे अनंत मानते हैं, जैसे वेदांत और जैन धर्म।
आकाश अनंत है इसका कोई छोर नहीं। साल 2016 में आई एक रिपोर्ट की माने तो ब्रह्मांड करीब 93 अरब प्रकाश वर्ष चौड़ा है। प्रकाशवर्ष के पैमाने से हम किसी लंबी दूरी को नापते है। क्योंकि इसकी रफ्तार बहुत तेज होती है और वो एक सेकंड में करीब दो लाख किलोमीटर की दूरी तय कर लेता है। ऐसे में एक साल में प्रकाश जितनी दूरी तय करता है उसे ही पैमाना बनाकर नापा जाता है। अब तक ब्रह्मांड का नक्शा बनाने के लिए छह बार सर्वे हो चुके हैं, इसी से पता चला है की इसके अंदर 30 से 200 मेगापारसेक्स जितनी लंबी आकृतिया मौजूद हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ब्रह्मांड का कोई अंत नहीं है, यह अनंत है। ब्रह्मांड के विस्तार के कारण, यह अभी भी बढ़ रहा है, और इसका कोई बाहरी किनारा या सीमा नहीं है। ब्रह्मांड अनंत है और हमेशा से रहा है।

ब्लैक होल्स कैसे बनते है?

ब्लैक होल्स बनने का मुख्य कारण किसी विशालकाय तारे जो सूर्य से बड़े होते है का ढहना या उसकी जीवनलीला का समाप्त होना होता है। जब किसी विशालकाय तारे का सारा ईंधन खत्म हो जाता हैं तो उसका केंद्र अपने गुरुत्वाकर्षण की वजह से ढह जाता हैं और वह फट कर मर जाता हैं इस प्रक्रिया में तारे का केंद्र अस्थिर होकर ढह जाता है और तारे की बाहरी परते अंतरिक्ष में उड़ जाती है जिससे तारे के केंद्र में एक सुपरनोवा विस्फोट होता है और वह तारा ब्लैक होल में बदल जाता हैं। ब्लैक होल बनने के बाद, यह अपने आसपास के द्रव्यमान को अवशोषित करके बड़ा हो सकता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि ब्लैक होल अन्य तरीकों से भी बन सकते हैं जो अभी तक अज्ञात हैं।

ब्लैक होल्स कितने प्रकार के होते हैं?

हमारे ब्रह्मांड में 4 प्रकार के ब्लैक होल्स मौजूद हैं। आदिकालीन या आदिम ब्लैक होल, तारकीय ब्लैक होल, मध्यम द्रव्यमान वाले ब्लैक होल और सुपरमैसिव ब्लैक होल।

1. आदिकालीन, आदिम, मिनिएचर या प्राइमर्डियल (प्राचीन) ब्लैक होल

आदिम ब्लैक होल (primordial black holes) का जन्म ब्रह्मांड के शुरुआती क्षणों में, यानी बिग बैंग के बाद के कुछ ही सेकंड में हुआ था। उस समय, ब्रह्मांड बेहद गर्म और घना था, और ऐसे में पदार्थ के कुछ ऐसे छोटे-छोटे टुकड़े हुए जो ब्लैक होल बनने के लिए ज़रूरी घनत्व और गुरुत्वाकर्षण वाले थे। इन आदिम ब्लैक होल्स का द्रव्यमान संभवतः एक पहाड़ से लेकर सूर्य से भी अधिक हो सकता था।

मिनिएचर ब्लैक होल (Miniature black hole) या माइक्रो ब्लैक होल (micro black hole) में क्वांटम मैकेनिक्स के प्रभाव महत्वपूर्ण होते हैं। यह अवधारणा स्टीफन हॉकिंग द्वारा 1971 में दी गई थी। ये ब्लैक होल अपने द्रव्यमान को हॉकिंग विकिरण के माध्यम से खो देते हैं, जिससे वे समय के साथ वाष्पित हो जाते हैं। इन छोटे ब्लैक होल का जीवनकाल बहुत कम होता है, कुछ नैनोसेकंड से भी कम। 

मिनिएचर ब्लैक होल एक काल्पनिक अवधारणा है, लेकिन यह क्वांटम गुरुत्व और ब्रह्मांड के बारे में हमारे ज्ञान को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

इस तरह के ब्लैक होल्स एक या दो पाउंड जितने छोटे, एक परमाणु जितने छोटे या अत्यंत छोटे होते हैं। इन्हे काल्पनिक ब्लैक होल भी कहते है, इनका पता लगाना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि ये ब्रह्मांड में चुपचाप तैर सकते है। ये ब्लैक होल ब्रह्मांड के सभी डार्क मैटर का निर्माण कर सकते है अगर इनका द्रव्यमान एक खास सीमा के अंदर हो। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ये आदिम ब्लैक होल अभी भी ब्रह्मांड में हो सकते हैं लेकिन इनका पता लगाना बहुत ही मुश्किल है।

आदिम ब्लैक होल का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से लेकर छोटे कणों के द्रव्यमान तक हो सकता है और कुछ का द्रव्यमान तो एक पेपरक्लिप से भी छोटा या एक विशाल पहाड़ जितना हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन ब्लैक होल ने प्रारंभिक ब्रह्मांड में डार्क मैटर के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो सकती है।

2. तारकीय ब्लैक होल्स 

विशाल तारे जो सूर्य से 20 गुना या उससे अधिक बड़े होते हैं, अपने जीवन के दौरान परमाणु संलयन द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करते हैं।जब तारे का ईंधन खत्म हो जाता है, तो आंतरिक दबाव कम हो जाता है और तारे की गुरुत्वाकर्षण शक्ति उनके द्वारा बाहर की ओर दबाव से हावी हो जाती है। तारे का केंद्र अपने आप में ढह जाता है, जिससे यह अत्यधिक घनत्व में हो जाता है और एक ब्लैक होल बन जाता है। इस पतन के दौरान, एक सुपरनोवा विस्फोट होता है जो तारे के बाहरी आवरण को अंतरिक्ष में उड़ा देता है। तारे के केंद्र का जो बचा हुआ हिस्सा है, वह एक ब्लैक होल बन जाता है, जिसे तारकीय ब्लैक होल कहते है। अधिकांश तारकीय ब्लैक होल अदृश्य होते हैं, जो उनके आसपास के पदार्थ को “आकार” में खींचने की क्षमता के कारण होता है।

तारकीय ब्लैक होल का पता लगाना मुश्किल है, लेकिन खगोलशास्त्री एक्स-रे बाइनरी और अन्य तरीकों का उपयोग करते हैं, जो उनके आसपास पदार्थ को आकर्षित करने के कारण होते हैं।

तारकीय ब्लैक होल का द्रव्यमान आम तौर पर हमारे सूर्य के द्रव्यमान से 5 से 20 गुना अधिक होता है, लेकिन कुछ बड़े ब्लैक होल भी पाए गए हैं, जिनका द्रव्यमान 100 सौर द्रव्यमान तक पहुंच सकता है।

हमारी आकाशगंगा (मिल्की वे) में सबसे बड़ा तारकीय ब्लैक होल “गैया बीएच3” है, जिसका द्रव्यमान सूर्य से 33 गुना अधिक है।ब्रह्मांड में सबसे बड़े तारकीय ब्लैक होल “फीनिक्स ए” है जिसका द्रव्यमान 100 अरब सूर्यों के बराबर है। 

दो न्यूट्रॉन तारों या ब्लैक होल के टकराने से भी तारकीय ब्लैक होल बन सकते हैं।

यदि सुपरनोवा विस्फोट के बाद तारे के केंद्र का जो भाग बचता है उसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से लगभग तीन गुना कम है, तो वह न्यूट्रॉन तारे का रूप ले लेता है, यदि बचा हुआ भाग अधिक विशाल है, तो वह ब्लैक होल में ढह जाएगा। न्यूट्रॉन तारे अत्यधिक घने होते हैं। दो न्यूट्रॉन तारो के टकराने से गामा-रे नामक विकिरण का एक विशाल विस्फोट होता है जिससे एक नया तारकीय ब्लैक होल बनता हैं।

न्यूट्रॉन तारा (neutron star) ब्रह्मांड में एक अत्यंत सघन तारा होता है। न्यूट्रॉन तारा मुख्य रूप से न्यूट्रॉन से बना होता है, और इसका घनत्व बहुत ही उच्च होता है।

न्यूट्रॉन तारे ब्रह्मांड में सबसे घने वस्तुओं में से हैं, जिनका घनत्व परमाणु नाभिक के बराबर होता है। न्यूट्रॉन तारे अक्सर बहुत तेज गति से घूमते हैं, और कुछ न्यूट्रॉन तारे (पल्सर) नियमित अंतराल पर रेडियो तरंगें भी उत्सर्जित करते हैं। न्यूट्रॉन तारों के चुंबकीय क्षेत्र बेहद शक्तिशाली होते हैं, जो पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से कई गुना अधिक मजबूत होते हैं। न्यूट्रॉन तारे बनने के समय अत्यधिक गर्म होते हैं, लेकिन धीरे-धीरे ठंडे होते हैं।

न्यूट्रॉन तारे छोटे होते हैं, जिनका व्यास लगभग 20 किलोमीटर तक होता है।

हमारी आकाशगंगा (मिल्की वे) में अनुमानित तौर पर 100 मिलियन तारकीय ब्लैक होल हो सकते हैं, जबकि ब्रह्मांड में लगभग 40 क्विंटिलियन तारकीय ब्लैक होल हो सकते हैं।

3. मध्यवर्ती द्रव्यमान वाले ब्लैक होल्स 

मध्यवर्ती द्रव्यमान वाले ब्लैक होल (Intermediate-mass black holes or IMBHs) ऐसे ब्लैक होल होते हैं जिनका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से 100 से 100,000 गुना अधिक होता है। ये तारकीय द्रव्यमान और अतिविशाल ब्लैक होल के बीच में आते हैं।

इन ब्लैक होल के बनने की प्रक्रिया अभी भी पूरी तरह से समझ में नहीं आई है, लेकिन कुछ प्रमुख सिद्धांत हैं। जब दो या दो से अधिक तारकीय ब्लैक होल आपस में टकराते हैं और विलय करते हैं, तो वे एक मध्यवर्ती द्रव्यमान वाला ब्लैक होल बना सकते हैं।

कुछ सिद्धांत बताते हैं कि ये ब्लैक होल गैस के सीधे पतन से भी बन सकते हैं, बिना किसी तारे के सुपरनोवा विस्फोट के।

आकाशगंगा के केंद्र में स्थित अतिविशाल ब्लैक होल से भी मध्यवर्ती द्रव्यमान वाले ब्लैक होल बन सकते हैं, जब वे गैस और तारों को अवशोषित करते हैं।

यह मध्यवर्ती द्रव्यमान वाले ब्लैक होल बौनी आकाशगंगाओं के केंद्र में पाए जाते है।

मध्यवर्ती द्रव्यमान वाले ब्लैक होल का अध्ययन करना खगोलविदों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें यह समझने में मदद कर सकता है कि कैसे छोटे ब्लैक होल बड़े ब्लैक होल में विकसित होते हैं, और यह भी कि आकाशगंगाएँ कैसे बनती हैं और विकसित होती हैं।

4. सुपरमैसिव ब्लैक होल्स

सुपरमैसिव ब्लैक होल, ब्लैक होल का सबसे बड़ा प्रकार है, जिसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से लाखों से लेकर अरबों गुना अधिक होता है। ये लगभग हर आकाशगंगा के केंद्र में पाए जाते हैं। हमारे आकाशगंगा, मिल्की वे के केंद्र में स्थित सुपरमैसिव ब्लैक होल को Sagittarius A* (Sgr A*) कहा जाता है, जिसका द्रव्यमान 4 मिलियन सूर्य के द्रव्यमान से भी अधिक है। यह हमसे लगभग 26,000 प्रकाश-वर्ष दूर है।

सुपरमैसिव ब्लैक होल बनने के कई तरीके हैं, जिनमें शामिल है।
सुपरमैसिव ब्लैक होल तारकीय ब्लैक होल के विलय से बनते हैं।जब दो आकाशगंगाएँ टकराती हैं, तो उनके केंद्र में मौजूद ब्लैक होल भी आपस में मिल जाते हैं, जिससे एक बड़ा ब्लैक होल बनता है।
आकाशगंगाओं के केंद्र में मौजूद विशाल गैस और धूल के बादल ब्लैक होल की ओर आकर्षित होते हैं और उस पर गिरते हैं, जिससे ब्लैक होल का द्रव्यमान बढ़ता है।
कुछ सिद्धांतों के अनुसार, सुपरमैसिव ब्लैक होल ब्रह्मांड की शुरुआत में ही बन गए थे, जब विशाल गैस के बादल बिना किसी मध्यवर्ती चरण के सीधे ब्लैक होल में बदल गए थे।
एक और सिद्धांत यह है कि सुपरमैसिव ब्लैक होल तारों के एक बड़े समूह के गुरुत्वाकर्षण पतन से बन सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने मिनी सुपरमैसिव ब्लैक होल की भी खोज की है। मिनी सुपरमैसिव ब्लैक होल कोई अलग श्रेणी नहीं है, बल्कि यह एक सामान्य सुपरमैसिव ब्लैक होल से छोटा होता है। ये आमतौर पर बौनी (dwarf) आकाशगंगाओं के केंद्र में पाए जाते हैं। इनकी खोज से यह जानने में मदद मिलती है कि ब्रह्मांड की शुरुआत में विशालकाय ब्लैक होल कैसे बने होंगे। यहां मिनी सुपरमैसिव ब्लैक होल के बारे में कुछ मुख्य बातें दी गई हैं:
इनका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 50,000 से 1,00,000 गुना हो सकता है।
वैज्ञानिकों ने सबसे छोटा ज्ञात मिनी सुपरमैसिव ब्लैक होल बौनी आकाशगंगा RGG 118 में खोजा है, जिसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का केवल 50,000 गुना है। 
वैज्ञानिक अभी भी इस बात पर शोध कर रहे हैं कि ये ब्लैक होल कैसे बनते हैं, लेकिन इसके दो मुख्य सिद्धांत हैं:
हल्के ब्लैक होल के बीज (Light black hole seeds): इस सिद्धांत के अनुसार, ब्रह्मांड के शुरुआती और विशाल तारों के अवशेष से हल्के ब्लैक होल बने। इन हल्के बीजों का द्रव्यमान सूर्य से लगभग 100 से 1000 गुना था। फिर उन्होंने अपने आस-पास की गैस और धूल को अवशोषित करके धीरे-धीरे अपना द्रव्यमान बढ़ाया।
भारी ब्लैक होल के बीज (Heavy black hole seeds): एक अन्य विचार यह है कि ये सीधे विशाल गैस के बादलों के गुरुत्वाकर्षण से ढहने के कारण बने, जिससे शुरुआती दौर में ही 10,000 से 1,00,000 सौर द्रव्यमान वाले भारी ब्लैक होल बने।
मिनी सुपरमैसिव ब्लैक होल की खोज वैज्ञानिकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह समझने में मदद करती है कि कैसे शुरुआती ब्रह्मांड में ब्लैक होल इतनी तेजी से विकसित हुए और विशालकाय सुपरमैसिव ब्लैक होल बन गए, जो आज बड़ी आकाशगंगाओं के केंद्र में देखे जाते हैं।

ब्लैक होल्स क्या खाते हैं?

ब्लैक होल, अपनी मजबूत गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण, आसपास की किसी भी चीज को निगल जाते हैं, जिसमें गैस, धूल, तारे, छोटे ब्लैक होल, अन्य खगोलीय पिंड और यहां तक कि प्रकाश भी शामिल है। ये अपनी पड़ोसी आकाशगंगाओं की गैस को भी खाते है। 

हमारे ब्रह्मांड का सबसे बड़ा ब्लैक होल कौन सा है?

ब्रह्मांड का सबसे बड़ा ब्लैक होल, फीनिक्स ए है। यह एक सुपरमैसिव ब्लैक होल है और यह एक आकाशगंगा के केंद्र में स्थित है। इसका द्रव्यमान सूर्य से 100 बिलियन गुना ज़्यादा है। यह कुछ पूरी आकाशगंगाओं से भी बड़ा है। एक और ब्लैक होल है जिसका नाम है Ton 618 यह भी बहुत बड़ा है, लेकिन फीनिक्स-ए के मुकाबले थोड़ा छोटा इसका वजन 66 अरब सूरजों के बराबर है।

फीनिक्स ए अपने आस-पास आने वाली सभी चीजों को निगल जाता है, ये लाखों करोड़ों तारों को निगलता है। इसलिए ये ब्रह्मांड का सबसे बड़ा ब्लैक होल है। ये इतना बड़ा है की हमारी पूरी मिल्की वे गैलेक्सी को ही निगल सकता हैं। ये इतना बड़ा है कि हमारी मिल्की वे गैलेक्सी इसके सामने एक फुटबॉल है और ये उसका पूरा स्टेडियम।

हमारे ब्रह्मांड का सबसे छोटा ब्लैक होल कौन सा है?

हमारे ब्रह्मांड का सबसे छोटा ज्ञात ब्लैक होल, जिसे “द यूनिकॉर्न” भी कहा जाता है, सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 3 गुना है, और यह एक लाल बौने तारे के साथ जुड़ा हुआ है।

खगोलविदों ने इसे द यूनिकॉर्न (The Unicorn) नाम भी दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह ब्लैकहोल बहुत ही खास है और उन्होंने इसे द यूनिकॉर्न नाम इसलिए दिया क्योंकी एक तो यह अपनी तरह का अनोखा ब्लैकहोल है और दूसर यह मोनोसेरोस- द यूनिकॉर्न तारामंडल में पाया गया है। यह ब्लैकहोल पृथ्वी से 1500 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है और अभी हमारी गैलेक्सी मिल्कीवे के अंदर ही मौजूद हैं।

यूनिकॉर्न के मामले में, खगोलविद 1,500 प्रकाश वर्ष दूर एक लाल विशालकाय तारे का अवलोकन कर रहे थे। तारे की गति के अवलोकन से पता चला कि एक बड़ी वस्तु उसे खींच रही थी। वस्तु के द्रव्यमान के अनुमान के अनुसार यह लगभग तीन सौर द्रव्यमान के बराबर था, फिर भी अवलोकन से ऐसी कोई वस्तु नहीं मिली। इस प्रकार, खगोलविदों ने निर्धारित किया कि यह वस्तु एक ब्लैक होल थी, और यह ब्रह्मांड में अब तक पाया गया सबसे छोटा ब्लैक होल बन गया।

ब्लैक होल के होने की सबसे पहले जानकारी किसने दी?

ब्लैक होल के बारे में सबसे पहली जानकारी भौतिकी वैज्ञानिक जॉन मिशेल ने 1783 में दी थी। उन्होंने अपने एक पत्र में एक ऐसे विशालकाय और भारी पिंड के बारे में बताया जो सूर्य के प्रकाश को अपने अंदर अवशोषित कर लेता है। जॉन मिशेल एक अंग्रेजी देहाती पादरी थे। वे अपने समय के सबसे प्रतिभाशाली और मौलिक वैज्ञानिक थे, लेकिन जॉन मिशेल आज भी अज्ञात है। शायद इसीलिए क्योंकि उन्होंने अपने स्वयं के पथ प्रदर्शक विचारों को विकसित करने और बढ़ावा देने के लिए बहुत कम काम किया।

अल्बर्ट आइंस्टाइन ने साल 1916 में अपने सामान्य सापेक्षता सिद्धांत के जरिए ब्लैक होल के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी।

सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर ने 11 जनवरी 1935 में ब्लैक होल के बारे में अपने विचार प्रकट किए। हालांकि ब्लैक होल शब्द का इस्तेमाल 1967 में अमेरिकी खगोलशास्त्री जॉन व्हीलर ने किया था।

क्या कोई ब्लैक होल सूर्य को निगल सकता हैं?

हाँ, अगर एक ब्लैक होल पर्याप्त करीब आ जाए, तो वह सूर्य को निगल सकता है, लेकिन इसके लिए ब्लैक होल का सूर्य के मुकाबले काफी बड़ा होना आवश्यक है, या फिर सूर्य के करीब से गुजरने वाली कोई भी बड़ी वस्तु उसके गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित होगी। हालांकि, इस घटना की संभावना बहुत ही कम है क्योंकि ब्रह्मांड में पर्याप्त सूर्य के करीब कोई ब्लैक होल मौजूद नहीं है।

ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण के कारण सूर्य का पदार्थ उसके अंदर खींचा जा सकता है। ब्लैक होल के बहुत करीब पदार्थ पहुंचने पर उसके ऊपरी सतह से पदार्थ को अलग कर दिया जाता है, जिससे सौरमंडल में अराजकता फैल सकती है। ब्लैक होल के पास से प्रकाश किरणें भी बच नहीं सकती हैं।

अगर एक शक्तिशाली ब्लैक होल सौरमंडल के करीब आता है, तो पूरा सौरमंडल उसकी ओर खिंच जाएगा और उसके बुनियादी कणों तक सिमट जाएगा। ब्लैक होल सूर्य को निगलने के बाद पृथ्वी पर जीवन समाप्त हो जाएगा क्योंकि पृथ्वी को प्रकाश और गर्मी नहीं मिल पाएगी।

हमारे निकटतम ब्लैक होल काफी दूर हैं, इसलिए सूर्य पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यहां तक कि एक ब्लैक होल के करीब पहुंचने पर भी सूर्य का द्रव्यमान उसकी ओर खिंचे हुए पदार्थ के लिए बहुत कम है।

यह घटना होने के लिए, एक ब्लैक होल को सूर्य को अपने अंदर समाहित करने के लिए पर्याप्त बड़ा होना पड़ेगा।

ब्लैक होल्स के इवेंट होराइज का क्या मतलब है? 

इवेंट होराइजन या घटना क्षितिज ब्लैक होल की सीमाओं को चिन्हित करने वाली सीमा होती है, इसे “पॉइंट-ऑफ-नो-रिटर्न” भी कहा जाता है। यह स्पेस टाइम में एक एसी सीमा होती है जिसके पार होने वाली घटनाएं बाहर के ब्रह्मांड पर कोई असर नहीं डालती हैं और ना ही इस सीमा के बाहर बैठे किसी दर्शक को यह ज्ञात हो सकता कि इस क्षितिज के पार क्या हो रहा है? इस सीमा के पार गुरुत्वाकर्षण इतना अधिक हो जाता हैं कि कोई भी चीज यहां तक कि प्रकाश भी बाहर नहीं निकल पाता। इसे ही ब्लैक होल कहते है। इवेंट होराइजन (घटना क्षितिज) कोई भौतिक सतह नही है, बल्कि यह केवल गणितीय रूप से परिभाषित सीमांकन सीमा है, इसलिए  पदार्थ और ऊर्जा को ब्लैक होल में आने से कोई नहीं रोक सकता है केवल बाहर निकलने से रोकता है। इवेंट होराइजन का आकार ब्लैक होल के द्रव्यमान पर निर्भर करता है। अधिक द्रव्यमान वाला ब्लैक होल बड़ा इवेंट होराइजन बनाता है।

अगर हम ब्लैक होल के अंदर चले जाए तो हमारा क्या होगा?

वैसे तो ब्लैक होल के अंदर जाकर क्या होगा? यह आज तक कोई नहीं जान पाया है और शायद ही अभी या भविष्य में हम सभी पृथ्वी वासी अपने जिंदा रहने तक ब्लैक होल के अंदर क्या है? और वहां जाकर पदार्थ या मनुष्य आदि का क्या होता है? कभी जान पाए लेकिन हम सिर्फ वैज्ञानिक अनुमान ही लगा सकते हैं। शायद ही हमारी टेक्नोलॉजी कभी इतनी एडवांस हो पाएगी की हम कोई ऐसा स्पेस यान या टाइम मशीन बना पाए की ब्लैक होल के अंदर क्या है? इसका पता लगा पाएं।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जब हम ब्लैक होल के करीब होंगे तो हमे उसके आस-पास होने का अहसास पहले ही हो जाएगा क्योंकि ब्लैक होल की गुरुत्वाकर्षण शक्ति हमें अपनी और खींचेगी चाहे वह हमसे बहुत दूर ही क्यों ना हो। फिर हम ब्लैक होल की सीमा यानी कि इवेंट होराइजन के करीब आ जायेंगे यदि हम इस इवेंट होराइजन के करीब आने से अपनेआप को बचा सके तो हम बच जायेंगे वरना हम ब्लैक होल के अंदर ही चले जायेंगे क्योंकि इवेंट होराइजन को “बिना वापसी का बिंदु” (point of no return) कहा जाता है क्योंकि यह ब्लैक होल की वह सीमा है जिसके अंदर जाने के बाद कोई भी चीज़, यहाँ तक कि प्रकाश भी, वापस बाहर नहीं निकल सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि घटना क्षितिज के अंदर पलायन वेग (escape velocity) प्रकाश की गति से अधिक हो जाता है, और कोई भी वस्तु प्रकाश की गति से तेज़ यात्रा नहीं कर सकती है। ब्लैक होल के करीब आकर समय बहुत धीमा चलता है। इवेंट होराइजन में प्रवेश करते ही अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण की वजह से हम नूडल्स की तरह खींचते चले जायेंगे इसे स्पेगेटिफिकेशन कहते हैं, यानि स्पेगेटी की तरह लंबा खींचता चला जाना। हमारा शरीर लंबा खींचता चला जायेगा चारो तरफ से यह तब तक खींचता रहेगा जब तक हमारे शरीर के टुकड़े ना हो जाए, वैसे हमारी मृत्यु तो इवेंट होराइजन में प्रवेश करने से पहले ही हो जाएगी अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण की वजह से। जब हमारे शरीर के टुकड़े हो जाएंगे तो उन टुकड़ों की टिश्यू और कोशिकाए भी टूटेगी फिर उनके छोटे-छोटे सुक्ष्म कण बनेंगे और यह प्रक्रिया तब तक चलती रहेगी जब तक हम ब्लैक होल के केंद्र में जाकर गायब ना हो जाए। इस बिंदु को वैज्ञानिक सिंगुलैरिटी कहते हैं और यह सब कुछ ही सेकंड या मिनट में हो जायेगा, वैसे कुछ वैज्ञानिकों का ये भी मानना है कि हम ब्लैक होल में जीवित ही रहेगें और हमारी होलोग्राफिक इमेज बन जायेगी जिससे हम अपने मूल रूप में जीवित रहेंगे और हम जिस अवस्था में ब्लैक होल में गए थे या गिरे थे हम उसी अवस्था में रहेगें। ब्लैक होल में समय और अंतरिक्ष(स्थान) का कोई महत्व नहीं होता, माना जाता है कि यहां ये दोनों ही चीजें रूक जाती हैं।

कुछ वैज्ञानिकों का यह अनुमान है कि ब्लैक होल का दूसरा छोड़ व्हाइट होल से जुड़ा हुआ होता है और यह एक वर्महोल द्वारा  कनेक्ट होता है जो एक सुरंग की तरह होता है, यानि की हमारे ब्रह्मांड का ब्लैक होल दूसरे ब्रह्मांड के व्हाइट होल से जुड़ा होगा। जिस प्रकार ब्लैक होल अपने आस-पास की चीजों को निगल जाता है उसी प्रकार व्हाइट होल अपने अंदर समाई हुई चीजों को बाहर निकालता है इसलिए अगर हम ब्लैक होल में बचे रहे तो हम व्हाइट होल से सुरक्षित बाहर निकल आएंगे अपनी उसी उम्र में जिस उम्र में हम ब्लैक होल में गए थे क्योंकि ब्लैक होल में समय और अंतरिक्ष(स्थान) का कोई महत्व नहीं होता, समय और अंतरिक्ष दोनों ही ब्लैक होल में ठहर जाते है, कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ब्लैक होल में समय और अंतरिक्ष का कोई महत्व ना होने से अगर हम कुछ बिलियन वर्षों तक बचे रहे ब्लैक होल में तो वही ब्लैक होल व्हाइटहोल में बदल जाएंगा (ध्यान रहे की ब्लैक होल के अंदर तो समय रुक जाता हैं लेकिन ब्लैक होल के बाहर तो समय चलता रहता हैं) इसलिए अगर हम ब्लैक होल में बचें रहे तो शायद ब्लैक होल के बाहर क्या हो रहा है? हम देख सकते है लेकिन ब्लैक होल के बाहर का कोई दर्शक ब्लैक होल में क्या हो रहा है? वह नहीं देख सकता ब्लैक होल के अंधकार की वजह से क्योंकि ब्लैक होल प्रकाश को भी निगल लेता है। अपने इस अनोखे गुण के कारण ब्लैक होल को कई वैज्ञानिक प्राकृतिक टाईम मशीन भी मानते है।

कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ब्लैक होल में जाकर हमारा क्या होगा? ये इस बात पर डिपेंड करता है की हम किस प्रकार के ब्लैक होल में गए है तारकीय ब्लैक होल में या सुपरमैसिव ब्लैक होल में।यदि हम तारकीय ब्लैक होल में गए तो हम नूडल्स की तरह खींच जायेंगे और हमारे शरीर के दो टुकड़े हो जाएंगे वो भी इवेंट होराइजन में घुसने से पहले ही क्योंकि तारकीय ब्लैक होल की गुरुत्वाकर्षण की शक्ति सुपरमैसिव ब्लैक होल से ज्यादा ताकतवर होती है यानि हम तारकीय ब्लैक होल के इवेंट होराइजन में घुसने से पहले ही मर जाएंगे और यदि हम सुपरमैसिव ब्लैक होल में गए तो हम इवेंट होराइजन में घुस जायेंगे बिना किसी नुकसान के और हम ब्लैक होल में अपनेआप को गिरता हुआ पायेंगे और हम तब तक गिरते हुए जायेंगे जब तक की हम ब्लैक होल के प्वाइंट ऑफ सिंगुलैरिटी तक ना पहुंच जाए जहां घनत्व का कोई अंत नहीं होता और हम उस प्वाइंट के अंदर चले जाते हैं और गायब हो जाते हैं अगर ऐसे में कोई वैज्ञानिक हमको कही दूर से देख रहा होगा अपने कोई स्पेशल टेलीस्कोप से तो उसे अलग तस्वीर दिखाई देगी। उसे दिखाई देगा की हम ब्लैक होल में स्लो मोशन में गिरते जा रहे है, गिरते जा रहे है और हम आखिर में बर्फ की तरह जम जायेंगे और गायब होकर खत्म हो जाएंगे। आखिर ऐसा होता क्यों है? माना जाता है की यह इसलिए होता है क्योंकि इवेंट होराइजन के अंदर जाकर समय और अंतरिक्ष(स्थान) एक दूसरे की जगह ले लेते है यानि की इवेंट होराइजन में जाकर समय रुक जाता हैं और अंतरिक्ष चलता रहता है। क्योंकि फिजिक्स के नियम ब्लैक होल में खत्म हो जाते है इसलिए ब्लैक होल के अंदर क्या है शायद ही हम कभी जान पाए।

तारकीय द्रव्यमान वाले ब्लैक होल के घटना क्षितिज पर ज्वारीय बल, अतिविशाल ब्लैक होल के चारों ओर की तुलना में कहीं अधिक प्रचंड होते हैं।

ब्लैक होल के होने के सबूत तो मिले है लेकिन व्हाइटहोल और वर्महोल के कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले है। यह अभी तक सिर्फ थ्योरी में ही है इसलिए इन्हे काल्पनिक माना गया हैं। ब्लैक होल और व्हाइटहोल आइंस्टीन के स्पेस-टाइम और सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत पर आधारित है।

आइंस्टीन का सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत बताता है कि गुरुत्वाकर्षण कोई बल नहीं है, बल्कि द्रव्यमान और ऊर्जा के कारण स्पेस-टाइम (दिक्-काल) की वक्रता का परिणाम है। विशाल वस्तुएँ जैसे कि तारे और ग्रह स्पेस-टाइम को मोड़ देते हैं, और इसी मुड़े हुए स्पेस-टाइम में दूसरी वस्तुएँ चलती हैं, जिसे हम गुरुत्वाकर्षण के रूप में महसूस करते हैं। यह एक महत्वपूर्ण विचार है जो ब्लैक होल और ब्रह्मांड के विस्तार जैसी घटनाओं की व्याख्या करता है।

क्या ब्लैक होल पृथ्वी को निगल सकता हैं? या पृथ्वी ब्लैक होल में चली जाए तो क्या होगा?

पृथ्वी के सबसे नज़दीक का ब्लैक होल, गैया बीएच1 हैं जो पृथ्वी से 1,560 प्रकाश वर्ष दूर है यह विशालकाय ब्लैक होल इतना बड़ा है कि इसमें हमारे 10 सूरज समा जाएं, यह ब्लैक होल अपने तारे से उतनी ही दूरी पर चक्कर लगा रहा है, जितनी दूरी धरती की सूरज से है, खुशी की बात ये है कि यह ब्लैक होल सो रहा है, यह निष्क्रिय है, यह अपने अंदर हर किसी चीज को खींच नहीं रहा है। यह ब्लैक होल अंतरिक्ष में किसी ग्रैविटी की लहर का इंतजार कर रहा है ताकि इसका पेट भर सके, यह भूखा तो है लेकिन कमजोर है। इसलिए पृथ्वी को इस ब्लैक होल से कोई खतरा नहीं है और वैसे भी यह ब्लैक होल पृथ्वी से जितने प्रकाशवर्ष दूर है उस हिसाब से तो इस ब्लैक होल को पृथ्वी को निगलने में काफी लम्बा समय लग जायेगा शायद उससे पहले सूर्य ही पृथ्वी को निगल जाएं।

वैसे सैद्धांतिक रूप से पृथ्वी किसी ब्लैक होल द्वारा निगली जा सकती है, हालांकि यह अत्यंत असंभावित है क्योंकि ज्ञात ब्लैक होल हमसे बहुत दूर हैं; यदि ऐसा हुआ तो पृथ्वी का ब्लैक होल के प्रचंड गुरुत्वाकर्षण के कारण पूरी तरह से विनाश हो जाएगा, जिसे स्पैगेटीफिकेशन कहा जाता है, जिससे इसके अणु तक अलग हो जाएँगे।

अगर पृथ्वी को निगलने वाला ब्लैक होल छोटा हुआ तो नुकसान होने में समय लगेगा लेकिन, अगर पृथ्वी का सामना एक सुपरमैसिव यानी महाविशालकाय ब्लैक होल से होता है तो सेकेंड्स में सब खत्म हो जाएगा। बहुत जल्दी धरती सहित सब कुछ नूडल्स बन जायेगा और ब्लैक होल के केंद्र में जाकर समा जायेगा।

पृथ्वी के ब्लैक होल में जाने से पहले ही पृथ्वी में जीवन समाप्त हो जायेगा, शायद सुनामी, ज्वालमुखी या भूकंप जैसी कोई प्राकृतिक आपदा ही हम सभी जीवित प्राणियों को खत्म कर देगी।

कुछ अन्य वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी ब्लैक होल में जाने से पहले ही खत्म हो जाएगी वह इसलिए क्योंकि पृथ्वी के नजदीक कोई ब्लैक होल हुआ तो वह पृथ्वी से काफी प्रकाशवर्ष दूर होगा जब तक पृथ्वी उसके करीब पहुंचेगी तब तक शायद करोड़ों अरबों सालों का वक्त लग जाए उससे पहले शायद हमारा सूर्य ही नष्ट हो जाएगा और यह एक व्हाइट ड्वॉर्फ में बदल जाएगा और हमारा सूर्य ही पृथ्वी को निगल जाएगा इस प्रकार पृथ्वी पर जीवन नष्ट हो जाएगा।

ब्लैक होल बनने में कितना समय लगता है?

वैज्ञानिक अनुमान के अनुसार तारकीय ब्लैक होल बनने में एक सेकंड के दसवें हिस्से से लेकर आधे सेकंड तक का समय लगता है और सुपरमैसिव ब्लैक होल बनने में आमतौर पर अरबों साल लगते हैं।

क्या कोई ब्लैक होल पूरी आकाशगंगा या ब्रह्मांड को निगल सकता हैं?

वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार कोई भी ब्लैक होल पूरी आकाशगंगा या ब्रह्मांड को नहीं निगल सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि ब्लैक होल अपने विकास को सीमित कर लेते हैं। एक भी ब्लैक होल, चाहे वह हमारी आकाशगंगा के केंद्र में ही क्यों न हो, पूरी आकाशगंगा को निगलने के लिए बहुत छोटा है।

ब्लैक होल में गुरुत्वाकर्षण बहुत शक्तिशाली होता है, उनके आसपास का क्षेत्र एक सीमित दायरे में ही प्रभावी होता है। आकाशगंगा या ब्रह्मांड के विशाल आकार के कारण एक ब्लैक होल उन्हें पूरी तरह से निगलने में सक्षम नहीं होगा। कई आकाशगंगाओं के केंद्र में विशाल ब्लैक होल मौजूद हैं। इन ब्लैक होल का गुरुत्वाकर्षण शक्तिशाली होता है, लेकिन यह आकाशगंगा के सभी पदार्थों को निगलने के लिए पर्याप्त नहीं है। ब्रह्मांड की विशालता की तुलना में ब्लैक होल का आकार बहुत छोटा है। ब्रह्मांड में फैले हुए पदार्थों की मात्रा इतनी अधिक है कि एक ब्लैक होल उन्हें निगलने में सक्षम नहीं होगा। यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ब्लैक होल अंततः हॉकिंग विकिरण के माध्यम से वाष्पित हो जाते हैं, इसलिए वे हमेशा के लिए मौजूद नहीं रहेंगे। हालांकि एक ब्लैक होल आकाशगंगा को पूरी तरह से निगलने में सक्षम नहीं होगा, यह निश्चित रूप से आकाशगंगा के कुछ हिस्सों को प्रभावित कर सकता है, खासकर जब कोई तारा या अन्य वस्तु ब्लैक होल के करीब से गुजरती है।

क्या ब्लैक होल छोटे हो सकते है?

हाँ, बड़े ब्लैक होल का आकार भविष्य में छोटा हो सकता है। स्टीफन हॉकिंग के अनुसार ब्लैक होल “हॉकिंग विकिरण” नामक ऊर्जा खोकर धीरे-धीरे सिकुड़ते हैं। यह विकिरण ब्लैक होल से निकलने वाली ऊर्जा है, जो कणों के जोड़े के रूप में उत्पन्न होती है जिनमें से एक ब्लैक होल में गिर जाता है और दूसरा अंतरिक्ष में भाग जाता है। इस प्रक्रिया में ब्लैक होल अपनी ऊर्जा और द्रव्यमान खो देता है और अंततः वाष्पित हो सकता है।

छोटे ब्लैक होल अपेक्षाकृत तेजी से वाष्पित होते हैं, जबकि बड़े ब्लैक होल को वाष्पित होने में बहुत लंबा समय लगता है,।

सैद्धांतिक रूप से, सभी ब्लैक होल अंततः वाष्पित हो जाएंगे, लेकिन बड़े ब्लैक होल को वाष्पित होने में ब्रह्मांड की वर्तमान आयु से भी कहीं अधिक समय लगेगा।

ब्लैक होल एक दूसरे के साथ विलय भी कर सकते हैं, जिससे बड़े ब्लैक होल बनते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया भी अंततः ब्लैक होल के वाष्पीकरण की ओर ले जाती है।

ब्लैक होल का आकार बहुत भिन्न हो सकता है, कुछ परमाणु जितने छोटे होते हैं, जबकि अन्य सूर्य के द्रव्यमान से अरबों गुना बड़े होते हैं.

हॉकिंग विकिरण ब्लैक होल के घटना क्षितिज के पास क्वांटम यांत्रिकी के प्रभावों के कारण होता है। ये प्रभाव कण-एंटीपार्टिकल जोड़े बनाते हैं, जिनमें से एक ब्लैक होल में गिर जाता है और दूसरा भाग जाता है।

कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार बड़े ब्लैक होल्स वास्तव मे कभी भी छोटे नहीं हो सकते और जो ब्लैक होल्स शुरुआत से ही छोटे होते है वे आदिम, आदिकालीन या प्राइमर्डियल ब्लैक होल होते हैं जो एक परमाणु या उससे भी छोटे आकार के होते है।

क्या ब्लैक होल एक प्राकृतिक टाईम मशीन है?

हाँ, ब्लैक होल समय को धीमा करके और समय के साथ एक “बंद समय-सदृश वक्र” (closed timelike curve) बनाकर एक प्राकृतिक टाइम मशीन के रूप में कार्य करते हैं, लेकिन इसमें कई जटिलताएँ हैं: आप केवल भविष्य में यात्रा कर सकते हैं, और अतीत में जाने का कोई तरीका नहीं है, साथ ही ब्लैक होल में प्रवेश करने और सुरक्षित रूप से बाहर निकलने का कोई ज्ञात तरीका नहीं है।

वैज्ञानिक मानते है की ब्लैक होल एक प्राकृतिक टाईम मशीन हो सकती है। साल 1915 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने ‘थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी’ की बात कही थी। इसमें वक्त और रफ्तार के बीच संबंध को बताया गया। थ्योरी के अनुसार, समय पूरी तरह से गति पर निर्भर है, और स्पीड बढ़ने-घटने पर बदलता रहता है, इसे इस तरह से समझें, जैसे आप तेज भागें तो कम समय में ज्यादा दूरी तय कर लेंगे लेकिन स्पीड कम हो तो समय ज्यादा खर्च होगा, जबकि दूरी उतनी ही रहेगी अगर कोई इंसान अपनी स्पीड बहुत ज्यादा बढ़ा ले तो वो समय को क्रॉस करके आगे जा सकता है और फिर पीछे भी लौट सकता है यही टाइम ट्रैवल है। इसका ग्रेविटी यानी गुरुत्वाकर्षण से भी संबंध है। हम जितनी मजबूत ग्रेविटी के पास होंगे, समय उतने ही धीरे चलेगा। ब्लैक होल के पास बहुत ज्यादा ग्रेविटी होती है, जैसे-जैसे हम इसके करीब जाते हैं, समय धीरे चलने लगता है, फिर ऐसा होता है कि एक हद के बाद अंतरिक्ष और समय का मतलब खत्म हो जाता है, यहां समय रुक चुका होता है, ऐसे में जितने देर आप ब्लैक होल के किनारे या उसके सेंटर पर बिताएंगे, उतनी देर में पृथ्वी पर शायद हजारों साल बीत जाएं। लेकिन वास्तव में यहां जाने के बाद क्या होगा, ये अब तक कोई नहीं जान सका है, हो सकता है कि आप इसके अंदर जाकर किसी नए ग्रह में पहुंच जाएं। ये भी हो सकता है कि कोई होल के भीतर रहे और हमेशा के लिए वैसा ही रह जाए। सुपरमैंसिव ब्लैक होल यानी जो लाखों सूरज के बराबर बड़े ब्लैक होल्स हैं उनके बारे में वैज्ञानिक कुछ भी नहीं जानते हो सकता है कि अंदर जाने के बाद आप सबकुछ देखते हुए उसी उम्र में रह जाएं लेकिन बाहर का कोई इंसान आपको नहीं देख सकेगा क्योंकि रोशनी नहीं होगी क्योंकि ब्लैक होल रोशनी को निगल लेता है या फिर हम एक अन्य ब्रह्मांड में ही चले जाए। वर्तमान में, हमारे पास ऐसा कोई अंतरिक्ष यान या तकनीक नहीं है जो हमें ब्लैक होल के पास सुरक्षित रूप से ले जा सके और हमे वापिस ला सके।

क्या ब्लैक होल ब्रह्मांड का दानव है या वैक्यूम क्लीनर?

ब्लैक होल ब्रह्मांड का दानव या “वैक्यूम क्लीनर” नहीं है; यह एक आम गलत धारणा है। जबकि ब्लैक होल में बहुत मजबूत गुरुत्वाकर्षण होता है, उनका गुरुत्वाकर्षण प्रभाव काफी दूरी से उसी द्रव्यमान की किसी अन्य वस्तु के समान होता है। कोई चीज ब्लैक होल में तभी गिरती है जब वह उसके “घटना क्षितिज” नामक एक निश्चित सीमा के भीतर आ जाए; अन्यथा, वह ब्लैक होल के चारों ओर परिक्रमा करती रहती है।

सूर्य की जगह एक ब्लैक होल आ जाने पर भी पृथ्वी की कक्षा नहीं बदलेगी, क्योंकि ब्लैक होल केवल तभी पदार्थ को खींचता है जब वह उसके घटना क्षितिज से बहुत करीब आ जाए। ब्लैक होल का गुरुत्वाकर्षण, सूर्य या पृथ्वी जैसे अन्य ग्रहों के समान ही होता है, बस यह बहुत अधिक केंद्रित और शक्तिशाली होता है। यदि कोई ग्रह या तारा ब्लैक होल के घटना क्षितिज से बाहर है, तो वह बस उसकी परिक्रमा कर सकता है, उस ब्लैक होल में अंदर गिरने के बजाय।

ब्लैक होल जिसे निगलता है फिर उसके बारे में कुछ पता नहीं चल पाता। ब्रह्मांड में ऐसे कई तारे और ग्रह हैं जिन्हें ये निगल चुका है। वे पदार्थों को अंधाधुंध तरीके से नहीं खींचते हैं; केवल वे वस्तुएं ही अंदर खींची जाती हैं जो घटना क्षितिज को पार करती हैं। सुरक्षित दूरी पर परिक्रमा करने वाली वस्तुएं अप्रभावित रहती हैं, ठीक उसी तरह जैसे सूर्य के चारों ओर ग्रह रहते हैं।

क्या हमारा ब्रह्मांड एक ब्लैक होल के अंदर है? 

नहीं, हमारे ब्रह्मांड का एक ब्लैक होल के अंदर होने का कोई सीधा प्रमाण नहीं है; यह एक परिकल्पना है जिसे ब्लैक होल ब्रह्मांड विज्ञान (Black Hole Cosmology) के रूप में जाना जाता है, जो एक विचार है कि हमारा ब्रह्मांड एक विशाल ब्लैक होल का आंतरिक भाग हो सकता है, या बिग बैंग एक ब्लैक होल से जुड़ा हो सकता है, लेकिन यह अभी भी एक काल्पनिक और विवादास्पद विचार है जिसे वैज्ञानिक समुदाय गंभीरता से नहीं लेता है।

वही कुछ वैज्ञानिको का मानना है कि हमारा पूरा ब्रह्मांड एक ब्लैक होल के अंदर मौजूद हो सकता है, जो दूसरे ब्रह्मांड का हिस्सा है

इसके अनुसार, हमारा ब्रह्मांड एक बड़े मूल ब्रह्मांड में एक ब्लैक होल के अंदर एक शिशु ब्रह्मांड के रूप में पैदा हुआ हो सकता है।

कुछ शोधकर्ता ब्रह्मांड के विस्तार और एक ब्लैक होल के इवेंट होराइजन (घटना क्षितिज) के व्यवहार में समानताएं देखते हैं, जिससे यह विचार आता है।

वैज्ञानिकों को यह समझने में भी बहुत समस्या है कि ब्लैक होल के अंदर क्या होता है, क्योंकि उनके अंदर का भौतिकी अभी भी एक रहस्य है। यह विचार उन सवालों को संबोधित करने की कोशिश करता है कि बिग बैंग से पहले क्या हुआ था, और यह ब्रह्मांड की वर्तमान स्थिति की व्याख्या कर सकता है। 

ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को बढ़ाने के लिए नए विचार और सिद्धांत आवश्यक हैं, और यह सिद्धांत ब्रह्मांड की शुरुआत और उसके भविष्य के बारे में एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है।

क्या ब्लैक होल के अंदर जाने से कोई तारा बचा है?

हाँ, खगोलविदों ने पहली बार एक ऐसे तारे की पहचान की है जो एक विशाल ब्लैक होल के पास से गुजरने के बाद बच गया और फिर से चमक रहा है, जिससे पता चलता है कि तारे आंशिक रूप से ही बाधित हो सकते हैं और बच निकल सकते हैं। पहले के अध्ययनों में देखा गया था कि ब्लैक होल के पास आने वाले तारे अलग हो जाते हैं या टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं, लेकिन यह एक अपवाद है। 

सक्रिय और निष्क्रिय ब्लैक होल क्या है?

सक्रिय ब्लैक होल वह है जो सक्रिय रूप से पास के पदार्थ (जैसे गैस और तारे) को निगलता है, जिससे गर्म गैस की एक चमकदार अभिवृद्धि डिस्क बनती है जो प्रकाश और अन्य विकिरण उत्सर्जित करती है, और अक्सर शक्तिशाली जेट्स भी छोड़ती है। इसके विपरीत, एक निष्क्रिय या सुप्त ब्लैक होल सक्रिय रूप से पदार्थ नहीं खींचता है। इसके पास या तो कोई नज़दीकी साथी नहीं होता है, जिससे उसे खाने के लिए पदार्थ नहीं मिलता है, या फिर वह केवल कम मात्रा में पदार्थ ही खींचता है, जिससे बहुत कम या कोई विकिरण नहीं निकलता है और वह ज्यादातर अदृश्य रहता है।

सक्रिय ब्लैक होल अपने आसपास के पदार्थ, जैसे गैस और धूल को खींचते हैं, और इसे एक अभिवृद्धि डिस्क में जमा करते हैं। अभिवृद्धि डिस्क में मौजूद पदार्थ अत्यधिक गर्म हो जाता है और एक्स-रे, रेडियो तरंगें और प्रकाश जैसे विकिरण उत्सर्जित करता है, जिससे ब्लैक होल चमकता है। कुछ सक्रिय ब्लैक होल पदार्थ को प्रकाश की गति के करीब की गति से अंतरिक्ष में शक्तिशाली जेट्स के रूप में बाहर भी निकालते हैं। सक्रिय ब्लैक होल ‘सक्रिय गैलेक्टिक नाभिक’ (AGN) और ‘क्वासर’ (Quasars) नामक चमकदार आकाशगंगाओं का स्रोत होते हैं। 

निष्क्रिय ब्लैक होल अपने आसपास से पदार्थ नहीं खींच पाते हैं, या फिर बहुत कम मात्रा में ही खींच पाते हैं। पदार्थ के न मिलने के कारण ये चमकते नहीं हैं और ज्यादातर दिखाई नहीं देते हैं, क्योंकि वे प्रकाश या कोई अन्य विकिरण उत्सर्जित नहीं करते। 

हमारी आकाशगंगा के केंद्रीय सुपरमैसिव ब्लैक होल, सैजिटेरियस ए* (Sagittarius A*) के बारे में माना जाता है कि यह एक निष्क्रिय ब्लैक होल है जब तक कि कोई बड़ा पदार्थ का टुकड़ा उसके पास न आ जाए।

क्या कोई निष्क्रिय ब्लैक होल दुबारा सक्रिय हो सकता है?

हाँ, एक निष्क्रिय (या सुप्त) ब्लैक होल दुबारा सक्रिय हो सकता है, और यह खगोलविदों द्वारा वास्तविक समय में देखा भी गया है। ऐसा तब होता है जब कोई तारा या गैस का बादल ब्लैक होल के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव क्षेत्र में आ जाता है और उसमें गिर जाता है, जिससे ब्लैक होल फिर से पदार्थ को निगलना और ऊर्जा छोड़ना शुरू कर देता है, जिससे उसका पुनः जागृत होना होता है।

जब आस-पास के तारे या गैस ब्लैक होल के प्रभाव क्षेत्र में प्रवेश करती हैं, तो ब्लैक होल उस पदार्थ को अपनी ओर खींचना शुरू कर देता है। इस प्रक्रिया से ब्लैक होल के चारों ओर मौजूद पदार्थ में ऊर्जा उत्पन्न होती है और यह एक चमक के रूप में देखी जा सकती है, जिससे खगोलविद इसे “जागृत” या सक्रिय ब्लैक होल के रूप में पहचानते है।

यह प्रक्रिया, निष्क्रिय आकाशगंगाओं के दीर्घकालिक सक्रियण और निष्क्रियता के चरणों का हिस्सा हो सकती है, जैसा कि कई अध्ययनों में देखा गया है।

वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक दूर के अतिविशाल ब्लैक होल को सुप्तावस्था से जागते हुए देखा है। उन्होंने देखा कि कैसे एक ब्लैक होल, जो लंबे समय से निष्क्रिय था, अचानक से उच्च ऊर्जा कणों के एक विशाल जेट का उत्सर्जन करना शुरू कर देता है। 

यह देखना एक दुर्लभ खगोलीय घटना है, क्योंकि सक्रिय और निष्क्रिय ब्लैक होल के चक्र लाखों साल में देखे जाते हैं, इसलिए वास्तविक समय में इस प्रक्रिया को देखना एक महत्वपूर्ण खगोलीय खोज है।

हमारी आकाशगंगा के बीच में Sagittarius A* नाम का एक विशालकाय ब्लैक होल मौजूद है। यह सूर्य से 4.3 मिलियन गुना भारी है और इसका व्यास लगभग 24 मिलियन किलोमीटर है. अभी यह शांत निष्क्रिय है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यह हमेशा सोया नहीं रहेगा। यह ब्लैक होल गैलेक्सी की संरचना को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।

ब्लैक होल तब सक्रिय हो जाता है जब वह आसपास की गैस और धूल को तेजी से खींचने लगता है. Sagittarius A* अभी निष्क्रिय है, लेकिन जब गैलेक्सी में कोई बड़ा बदलाव होगा, तो यह जाग सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह तब होगा जब हमारी गैलेक्सी छोटी गैलेक्सी Large Magellanic Cloud से टकराएगी। इससे ब्लैक होल के आसपास का सामान घूमने लगेगा और यह चमकदार हो जाएगा।

Large Magellanic Cloud हमारी मिल्की वे की एक उपग्रह गैलेक्सी है, जो 163,000 प्रकाश वर्ष दूर है। यह अनियमित आकार की है और मिल्की वे की परिक्रमा करती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह 2.4 अरब साल बाद हमारी गैलेक्सी से टकराएगी, इस टकराव से मिल्की वे की संरचना बदल जाएगी।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, Large Magellanic Cloud और मिल्की वे का टकराव आज से लगभग 2.4 अरब साल बाद होगा. यह समय ब्रह्मांड के पैमाने पर छोटा है, लेकिन इंसानी जीवन के हिसाब से बहुत लंबा है। इस टकराव के दौरान Sagittarius A* जाग उठेगा। डरहम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने EAGLE सिमुलेशन से यह अनुमान लगाया है।

Sagittarius A* की नींद टूटने का मतलब है कि यह सक्रिय हो जाएगा और गैस को खींचकर ऊर्जा छोड़ेगा, टकराव से LMC का सामान ब्लैक होल की ओर आएगा, जिससे यह 8 गुना बड़ा हो सकता है, इससे मिल्की वे एक क्वासर जैसी चमकदार गैलेक्सी बन जाएगी। यह घटना सूर्य मंडल को प्रभावित नहीं करेगी, लेकिन गैलेक्सी बदल देगी।

टकराव से मिल्की वे का स्टेलर हेलो 5 गुना बड़ा हो जाएगा और LMC के तारे इसमें मिल जाएंगे. Sagittarius A* सक्रिय होकर ऊर्जा जेट्स छोड़ेगा, जो ब्रह्मांड में चमक फैलाएगा. गैलेक्सी की आकृति बदल जाएगी, लेकिन सूर्य मंडल सुरक्षित रहेगा. यह घटना मिल्की वे को अन्य गैलेक्सियों जैसी बनाएगी।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह टकराव मिल्की वे को सामान्य बनाएगा, क्योंकि अभी Sagittarius A* अन्य गैलेक्सियों के ब्लैक होल से छोटा है। Durham University के शोध में कहा गया कि LMC का विनाश ब्लैक होल को जगा देगा. यह सिमुलेशन से पता चला है, लेकिन अभी यह सिर्फ अनुमान है।

अगर Sagittarius A* जाग गया, तो मिल्की वे एक एक्टिव गैलेक्टिक न्यूक्लियस बनेगी, जो ब्रह्मांड में चमकदार जेट्स छोड़ेगी. इससे गैलेक्सी का विकास तेज होगा, लेकिन सूर्य मंडल पर कोई खतरा नहीं. यह घटना ब्रह्मांड की समझ को बढ़ाएगी. वैज्ञानिकों को अभी और अध्ययन करने होंगे.

सबसे पहले ब्लैक होल की पहली तस्वीर कब, कैसे और किसने ली?

ब्लैक होल की पहली तस्वीर 10 अप्रैल 2019 में जारी की गई।

इवेंट होराइज़न टेलीस्कोप (EHT) नामक विश्वव्यापी रेडियो दूरबीनों के नेटवर्क का उपयोग करके इसे हासिल किया गया था।
यह एक वर्चुअल टेलीस्कोप की तरह काम करता है, जहाँ पृथ्वी पर कई रेडियो दूरबीनों से प्राप्त प्रेक्षणों को एक साथ मिलाकर एक विशाल टेलीस्कोप का प्रभाव पैदा किया जाता है। इस तस्वीर में ब्लैक होल के चारों ओर की चमकदार गैस के कारण बनने वाले प्रकाश वलय को दिखाया गया है, जो उसके तीव्र गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में मुड़ा हुआ है।
यह तस्वीर वैज्ञानिकों की एक अंतर्राष्ट्रीय टीम द्वारा ली गई थी। कंप्यूटर वैज्ञानिक केटी बोमन ने इस तस्वीर को बनाने के लिए उपयोग किए गए एल्गोरिदम को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

ब्लैक होल की आयु सीमा क्या है? या वे कैसे खत्म होते हैं?

ब्लैक होल की “आयु सीमा” ब्रह्मांड के अंत से भी कहीं अधिक लंबी होती है, लेकिन हॉकिंग विकिरण नामक प्रक्रिया से वे धीरे-धीरे वाष्पित होते हैं, एक प्रक्रिया जो छोटे ब्लैक होल के लिए तेज और विशाल ब्लैक होल के लिए बहुत धीमी होती है. एक सामान्य सूर्य-द्रव्यमान वाले ब्लैक होल को वाष्पित होने में लगभग 10^67 वर्ष लगेंगे.

ब्लैक होल का कोई निश्चित “मरने” का समय नहीं होता है, क्योंकि उनकी उम्र उनके द्रव्यमान पर निर्भर करती है.

स्टीफन हॉकिंग के सिद्धांत के अनुसार, ब्लैक होल हॉकिंग विकिरण उत्सर्जित करते हैं, जो कणों को अंतरिक्ष-समय से दूर ले जाते हैं. यह प्रक्रिया ब्लैक होल को धीरे-धीरे अपना द्रव्यमान खोने और अंततः वाष्पित होने का कारण बनती है.

ब्लैक होल जितना बड़ा होता है, उसे खत्म होने में उतना ही अधिक समय लगता है, छोटे ब्लैक होल (जैसे कि बिग बैंग के समय बने) तेजी से वाष्पित हो सकते हैं, जबकि विशालकाय ब्लैक होल को वाष्पित होने में ब्रह्मांड की वर्तमान आयु से भी कहीं अधिक समय लगेगा।

समय के साथ, तारे निर्माण बंद हो जाएगा और तारे जल जाएंगे, जिससे ब्रह्मांड एक ‘ब्लैक होल युग’ में प्रवेश करेगा. इस दौरान, जो महाविशाल ब्लैक होल बचे रहेंगे, वे धीरे-धीरे वाष्पित होते जाएँगे।

एक सूर्य के द्रव्यमान वाले ब्लैक होल को वाष्पित होने में लगभग 10^67 वर्ष लगेंगे, जो ब्रह्मांड की वर्तमान आयु से भी बहुत बड़ा है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि एक महाविशाल ब्लैक होल को पूरी तरह से खत्म होने में इससे भी कहीं ज्यादा समय लगेगा.

हॉकिंग विकिरण का अभी तक प्रयोगात्मक रूप से अवलोकन नहीं किया गया है। ब्रह्मांडीय ब्लैक होल के क्षय होने की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि हमें वर्तमान में इसे देखना असंभव है।

कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि ‘प्राइमॉर्डियल ब्लैक होल’ (PBHs) यानी बिग बैंग के तुरंत बाद बने छोटे ब्लैक होल, आज के समय में फट सकते हैं।

अगले 10 सालों में वैज्ञानिक ब्रह्मांड का ऐसा नजारा देख सकते हैं, जो अब तक कभी नहीं देखा गया. यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट (UMass Amherst) के वैज्ञानिकों का कहना है कि 90% संभावना है कि हमें ब्लैक होल के फटने जैसा विशाल विस्फोट दिखे,यह न सिर्फ खगोल विज्ञान की दशकों पुरानी थ्योरी को साबित करेगा, बल्कि ब्रह्मांड में मौजूद हर तरह के कणों का संग्रह भी सामने लाएगा। वे भी जिन्हें हम अब तक खोज ही नहीं पाए।

भौतिक विज्ञानी जोआकिम इगुआज़ जुआन कहते हैं, ‘यह ऐसा होगा जैसे हमें ब्रह्मांड की हर चीज का पूरा रिकॉर्ड मिल गया हो. यह भौतिकी को पूरी तरह बदल देगा और हमें ब्रह्मांड की कहानी दोबारा लिखने का मौका देगा।

UMass Amherst के वैज्ञानिकों का कहना है कि इन छोटे ब्लैक होल्स की अंतिम सांसें बेहद धमाकेदार होंगी। वे सुपरनोवा जैसे विस्फोट करेंगे और इस दौरान हर तरह का मौलिक कण बाहर निकलेगा, इसमें वे कण भी होंगे जिन्हें हम जानते हैं – जैसे इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन – और वे भी, जिन्हें हम अभी सिर्फ थ्योरी में मानते हैं – जैसे डार्क मैटर, सबसे बड़ी खोज होगी उन ‘अनजान-अनजाने’ कणों की, जिनके बारे में हमारी कल्पना तक नहीं है।

अब तक माना जाता था कि ऐसे विस्फोट बेहद दुर्लभ हैं, शायद हर 1 लाख साल में एक बार, लेकिन ताजा रिसर्च ने इस धारणा को चुनौती दी है। वैज्ञानिकों ने स्टैंडर्ड मॉडल फिजिक्स में कुछ बदलाव कर एक नया सिमुलेशन बनाया। इसमें उन्होंने ‘डार्क इलेक्ट्रॉन’ नामक कण को शामिल किया, जो सामान्य इलेक्ट्रॉन से भारी है और ब्लैक होल को एक हल्का चार्ज देता है, इससे PBHs कुछ समय के लिए स्थिर रह जाते हैं और उनका विस्फोट टल जाता है. इसका मतलब है कि वे अभी भी जिंदा हैं और आने वाले समय में फट सकते हैं।

रिसर्च टीम का कहना है कि इस मॉडल के अनुसार औसतन हर 10 साल में एक ब्लैक होल विस्फोट हमारे देखने की सीमा में होना चाहिए। हमारी मौजूदा गामा-रे ऑब्जर्वेटरी इस विस्फोट को पकड़ सकती है। अगर ऐसा हुआ तो यह पहली बार होगा जब हमें सीधे तौर पर हॉकिंग रेडिएशन के सबूत मिलेंगे, साथ ही, प्राइमॉर्डियल ब्लैक होल्स के अस्तित्व की पुष्टि होगी।

अगर अगले दशक में यह विस्फोट हुआ, तो यह विज्ञान की दिशा बदल सकता है. यह न सिर्फ ब्लैक होल की थ्योरी को सही ठहराएगा, बल्कि हमें यह भी बताएगा कि ब्रह्मांड किन-किन मौलिक कणों से बना है। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह खोज भौतिकी की सबसे बड़ी क्रांति होगी। यह रिसर्च Physical Review Letters जर्नल में छपी है।

ब्लैक होल से कैसी आवाज आती है?

ब्लैक होल खुद कोई आवाज़ पैदा नहीं करता क्योंकि अंतरिक्ष में आवाज़ के लिए माध्यम नहीं होता, लेकिन नासा ने ब्लैक होल से जुड़े गैस के दबाव के कंपन को रिकॉर्ड करके उसे ऑडियो में बदला है। यह ऑडियो असल में उस क्लस्टर की गर्म गैस में पैदा हुई दबाव तरंगों का पुनर्ध्वनिकरण है, जिसकी आवाज़ बहुत कम होती है और इंसानों की पहुँच से बाहर होती है।

ब्लैक होल के आसपास मौजूद गैस और धूल पर जब गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव पड़ता है, तो उसमें दबाव तरंगें (pressure waves) पैदा होती है। ब्लैक होल की आवाज़ को अक्सर “बहाव वाली” (whirlpool-like) या “समुद्र की लहरों” जैसी बताया गया है। कुछ उपयोगकर्ताओं को यह “भयावह” या “भूतिया” भी लगी है। यह आवाज़ वास्तव में उस ब्लैक होल के आसपास की गैस में होने वाली हलचल का संकेत है.

सनातन धर्म के अनुसार ब्लैक होल क्या है?

सनातन धर्म में ब्लैक होल का सीधा वर्णन नहीं है, लेकिन इसकी अवधारणा को ब्रह्म, शिव, या महाशून्य जैसी अवधारणाओं से जोड़कर समझा जा सकता है। हिंदू दर्शन के अनुसार, प्रलय के दौरान सभी ब्रह्मांडीय पदार्थ ‘शून्य’ में विलीन हो जाते हैं, और यह प्रक्रिया ब्लैक होल के सब कुछ अवशोषित करने के समान मानी जाती है। ब्लैक होल को एक ब्रह्मांडीय द्वार, या शिव के प्रचंड रूप के समान भी देखा जाता है, जो सृष्टि के अंत और नई शुरुआत का प्रतीक है।

परम सत्य या ब्रह्म को एक अनंत शक्ति के रूप में देखा जाता है जो प्रलय के दौरान सभी ब्रह्मांडीय चीज़ों को अपने में समाहित कर लेती है। यह अवशोषण अपरिवर्तनीय है और ब्लैक होल के घटना क्षितिज में आने वाली हर चीज़ को निगलने के समान है।

कुछ मान्यताओं के अनुसार, ब्लैक होल शिव का ही एक रूप है, जो महाशून्य का प्रतिनिधित्व करता है। यह एक ब्रह्मांड से दूसरे ब्रह्मांड में प्रवेश करने का द्वार हो सकता है।

हिंदू धर्म में ब्रह्मांड के चक्रीय होने की अवधारणा है, जिसमें सृष्टि का विनाश और फिर से सृजन होता है। ब्लैक होल को इस चक्र का अंत और नई शुरुआत का द्वार माना जा सकता है।

हिंदू धर्म में माया की अवधारणा है, जो बताती है कि भौतिक जगत वास्तविक नहीं है। ब्लैक होल के प्रबल गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र अंतरिक्ष और समय के ढाँचे को विकृत करते हैं, जिससे वास्तविकता का भ्रम या विकृति पैदा होती है।

संक्षेप में, ब्लैक होल का हिंदू धर्म में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन इसकी अवधारणा को ब्रह्म, शिव, प्रलय, और ब्रह्मांडीय चक्र की दार्शनिक अवधारणाओं के माध्यम से समझा जा सकता है।

हमारी अपनी काल्पनिक धारणा ब्लैक होल के बारे में 

क्या यह संभव है कि जैसा कि ऊपर बताया गया है कि समय के साथ हमारे ब्रह्मांड में तारे निर्माण बंद हो जाएगा और तारे जल जाएंगे यानी की हमारे ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं बचेगा ना तारें, ना ग्रह (जिसमे हमारी पृथ्वी भी शामिल हैं), ना क्षुद्र ग्रह और ना अन्य ब्रहमांडीय पदार्थ यानि की सभी तारें मरने के बाद ब्लैक होल में बदल जायेंगे और ब्लैक होल अपने पास आने वाले सभी पदार्थ को निगल लेगा जिससे ब्रह्मांड एक ‘ब्लैक होल युग’ में प्रवेश करेगा। यानि की ब्लैक होल्स के अलावा ब्रह्मांड में कुछ नही बचेगा तो फिर उस युग में बड़े ब्लैकहोल अपने से छोटे ब्लैक होल को अपने में विलय करते जायेंगे और यह प्रक्रिया निरंतर होने से आखिर में एक विशालकाय ब्लैक होल ही बचेगा जिसने अपने अंदर बहुत सारे ब्लैक होल्स विलय किए होंगे और यह पूरे ब्रह्मांड में एक काला बड़ा बिंदु होगा लेकिन अब इसे निगलने के लिए कुछ भी नही बचेगा तो यह धीरे धीरे सिकुड़ता जाएगा या वाष्पित होता जाएगा लेकिन इसके अंदर जितने भी ब्लैक होल्स, तारे, ग्रह, क्षुद्र ग्रह, अन्य खगोलीय पिंड और सभी ब्रहमांडीय पदार्थ जो इसने निगले है फिर चाहे वो इसके अंदर पूर्ण अवस्था में हो या क्षीण अवस्था में हो वो भी इस ब्लैकहोल के सिकुड़ने से एक दूसरे के करीब आ जायेंगे और जब यह ब्लैक होल एक छोटा सा बिंदु बंद जाएगा तो इसकी सिंग्युलैरिटी की वजह से इसके अंदर के सभी ब्रहमांडीय पदार्थ जैसे ब्लैक होल्स, तारे, ग्रह, क्षुद्र ग्रह, अन्य खगोलीय पिंड आदि की ऊर्जा एक दूसरे से टकराई होगी और फिर इस बिंदु में एक विशाल विस्फोट हुआ। जिससे समय, स्थान, और पदार्थ का जन्म हुआ और इसी से ही बिग बैंग थ्योरी की रचना हुई। हालांकि यह सिर्फ हमारी कल्पना है की शायद बिग बैंग से पहले ऐसा ही कुछ हुआ हो🤔।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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